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राष्ट्रीय युवा दिवस पर हुई ऑनलाइन परिचर्चा

कार्यक्रम में विशेष तौर पर स्वामी जी की छत्तीसगढ़ प्रवास और अन्य उपलब्धियों के साथ-साथ उनके विचारों पर चर्चा हुई।

by Admin

रायपुर :- ईमंच फाउंडेशन, एवं अन्य सामाजिक संस्थाओं “राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग “प्रादेशिक कान्यकुब्ज ब्राह्मण सभा छत्तीसगढ़” एवं “इनिशिएटिव फॉर मॉरल एन्ड कल्चरल ट्रेनिंग फाउंडेशन ” के संयुक्त तत्वाधान में, 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन के पावन अवसर, “राष्ट्रीय युवा दिवस” पर ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया है। कार्यक्रम का प्रसारण ईमंच के फेसबुक पेज एवं यूट्यूब चैनल पर किया गया।

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कार्यक्रम में विशेष तौर पर स्वामी जी की छत्तीसगढ़ प्रवास और अन्य उपलब्धियों के साथ-साथ उनके विचारों पर चर्चा हुई।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता वक्ता डॉ आशा जैन जी रही, जो की बहुआयामी और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व हैं। डॉ आशा जैन स्त्री रोग विशेषज्ञ के साथ साथ कई अन्य सामाजिक संस्थाओं में सचिव एवं विभिन्न संगठनों में कार्यालयों का हिस्सा रही हैं। आपने बताया की आप चिकित्सा के क्षेत्र और एचपीवी वैक्सीन से संबंधित कई लेख प्रकाशित कर चुकी हैं । कार्यक्रम का संचालन ईमंच के संस्थापक सीए मदन मोहन उपाध्याय द्वारा किया गया।

डॉ आशा जैन जी ने बताया की मात्र 25 साल की आयु में अपने गुरु से प्रभावित होकर नरेंद्रनाथ ने सांसारिक मोह माया त्याग दिया और संयासी बन गए, संन्यास लेने के बाद उनका नाम विवेकानंद पड़ा था। विवेकानंद जी की वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रुचि थी। इसके अलावा विवेकानंद जी ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का भी अध्ययन, जनरल असेम्बली इंस्टीटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया था।

स्वामी विवेकानंद जी का मत था की अध्यात्म, विद्या एवं भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा। 1877 ईस्वी को जब 14 साल का किशोर नरेन्द्र नाथ रायपुर आया, तब शायद ही यहां किसी को आभास रहा होगा कि यह नरेन्द्रनाथ भविष्य में स्वामी विवेकानंद के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बनाएगा। नरेन्द्र अपने पिता विश्वनाथ दत्त सहित मां भुवनेश्वरी देवी, छोटे भाई महेन्द्र व बहन जोगेन्द्रबाला के साथ रायपुर में करीब दो साल रहे। यह कोलकाता के बाद नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद) का किसी एक स्थान पर व्यतीत किया हुआ सर्वाधिक समय था। असल में उनके पिता विश्वनाथ दत्त पेशे से वकील थे। काम के सिलसिले में ही वे रायपुर आए थे, यहां अधिक समय तक रुकने की वजह से उन्होंने परिवार को भी यहां बुला लिया। वे परिवार समेत रायपुर के बूढ़ापारा में रहे।बताते हैं नरेन्द्र एवं उनका परिवार नागपुर से बैलगाड़ी के जरिए रायपुर पहुंचे। वहीं, कुछ संकेतों में व किताबों में उनके जबलपुर से ही बैलगाड़ी द्वारा मंडला, कवर्धा होकर रायपुर आने की बात कही जाती है।

नरेन्द्रनाथ की यह रायपुर-यात्रा इसलिए भी विशेष महत्वपूर्ण हो जाती है कि इस यात्रा में ही उन्हें अपने जीवन में पहली भाव-समाधि का अनुभव हुआ था।विश्वनाथ दत्त रायपुर में अपने मित्र रायबहादुर भूतनाथ डे के घर पर ठहरे थे। यहां कोतवाली चौक से कालीबाड़ी चौक की ओर जाने वाली सडक़ पर बाएं हाथ में डे भवन स्थित है। बताते हैं कि रायपुर में रहने के दौरान नरेंद्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) स्नान करने बूढ़ा तालाब ही जाया करते थे, इसलिए ही बूढ़ा तालाब को शासन ने विवेकानंद सरोवर नाम दिया।

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