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10 साल की मासूम की आंख में घुसी पूजा की घंटी: ऑपरेशन में हुआ चमत्कार

बिलासपुर :- दिवाली की रात जहां चारों ओर खुशियों का माहौल था, वहीं बिलासपुर की 9 साल की मासूम काव्या के परिवार के लिए यह रात एक भयानक सपने में बदल गई। पूजा के दौरान खेलते हुए वह ऐसी जगह गिरी कि पूजा की घंटी का ऊपरी हिस्सा उसकी बाईं आंख से होते हुए सीधे दिमाग में घुस गया। मामला इतना जटिल था कि डॉक्टरों ने भी इसे एक अत्यंत जोखिम भरा केस बताया, लेकिन रायपुर के डीकेएस अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने घंटों की मेहनत के बाद बच्ची को नई ज़िंदगी दे दी।

बिलासपुर निवासी दीपक सिंह की बेटी काव्या दिवाली की पूजा के दौरान खेलते हुए अचानक गिर गई। गिरते ही पूजा की घंटी का हैंडल उसकी आंख में जा घुसा। परिजनों ने तुरंत उसे नजदीकी अस्पताल पहुंचाया, जहां से हालत गंभीर देखते हुए सिम्स, बिलासपुर भेजा गया। वहां प्राथमिक उपचार के बाद बच्ची को तत्काल रायपुर के सरकारी अस्पताल डीकेएस सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल रेफर किया गया।

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डॉक्टरों की तत्परता और टीम वर्क

डीकेएस अस्पताल में इमरजेंसी कॉल आते ही डॉक्टरों की टीम तुरंत सक्रिय हो गई। डॉ. शिप्रा और उप अधीक्षक डॉ. हेमंत शर्मा ने पूरी टीम को बुलाया। ऑपरेशन का नेतृत्व डॉ. नमन चंद्राकर और डॉ. देवश्री ने किया, जबकि आंख की मरम्मत (Eye Repair) का जिम्मा डॉ. प्रांजल मिश्रा ने संभाला।

सीटी स्कैन में पता चला कि घंटी का हैंडल लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर तक दिमाग के ऊतकों में धंसा हुआ था और ऑर्बिट (आंख की हड्डी) को पार कर चुका था। स्थिति गंभीर थी और ज़रा सी गलती जानलेवा हो सकती थी।

4 घंटे चली नाजुक सर्जरी

टीम ने तय किया कि ऑपरेशन दूरबीन (Endoscopic) तकनीक से किया जाएगा ताकि दिमाग के ऊत्तकों को कम से कम नुकसान पहुंचे। सुप्राऑर्बिटल (भौंह के ऊपर) स्थान से सर्जिकल एक्सेस लिया गया और एंडोस्कोप की मदद से घंटी का धंसा हुआ हिस्सा धीरे-धीरे बाहर निकाला गया। करीब चार घंटे चली इस जटिल सर्जरी के बाद जब घंटी का हैंडल सुरक्षित रूप से बाहर निकाला गया, तो ऑपरेशन थिएटर में मौजूद सभी डॉक्टरों ने राहत की सांस ली।

सफल सर्जरी, चमत्कार जैसा परिणाम

पोस्ट-ऑपरेशन जांच में जब काव्या ने दोनों आंखों से साफ देखा और मुस्कुराई, तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।डॉक्टरों के अनुसार, घंटी इतनी गहराई तक पहुंचने के बावजूद काव्या के ब्लड वेसल्स और नर्व्स को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, और न ही उसे पैरालिसिस या मिर्गी के दौरे जैसी कोई जटिलता हुई।

डॉ. शिप्रा और उनकी टीम ने बताया कि यह सर्जरी (Diwali Accident) न सिर्फ तकनीकी रूप से कठिन थी, बल्कि भावनात्मक रूप से भी बेहद चुनौतीपूर्ण रही। दिवाली की रात कई डॉक्टर छुट्टी पर थे, लेकिन बच्ची की जान बचाने के लिए सभी तुरंत अस्पताल पहुंचे।

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