Home खबर जरा हटके छत्तीसगढ़ के इस एतेहासिक मंदिर में दर्शन के लिए खड़ा होना पड़ता है तिरछा…जानिए वजह…

छत्तीसगढ़ के इस एतेहासिक मंदिर में दर्शन के लिए खड़ा होना पड़ता है तिरछा…जानिए वजह…

by Wev Desk
छत्तीसगढ़ के इस एतेहासिक मंदिर में दर्शन के लिए खड़ा होना पड़ता है तिरछा…जानिए वजह...

छत्तीसगढ़ रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मॉ महामाया मंदिर का इतिहास 1400 साल पूराना माना जाता हैं और इस एतेहासिक मंदिर में पत्थर की चिंगारी से मनोकामना ज्योत जलाने की पंरपरा रही हैं. इसी पंरपरा को आगे बढ़ाते हुए इस वर्ष भी हजारों ज्योत प्रज्वलित किए जाएंगे. नौ दिनों तक यहां बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ रहती हैं जिसके लिए मंदिर परिसर में सुरक्षा के इंतजाम भी किए गए हैं.

नवमी के दिन होगी कन्या पूजन

ये पर्व हिंदू नव वर्ष की शुरुआत का भी प्रतीक होता है. नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि को कन्याओं का पूजन किये जाने की भी परंपरा है. नवरात्र की नवमी 10 अप्रैल को पढ़ रही हैं इस दिन विशेष रुप से कन्या भोज कराया जाएगा. इस दिन नवमी भी हैं. मॉ महामाया के दर्शन के बाद मॉ समलेश्वरी के दर्शन से पूर्ण मानी जाती है. पूजा ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार मॉ महामाया मॉ लक्ष्मी के रुप में दर्शन देती है साथ ही यहां मॉ समलेश्वरी भी विराजमान हैं, भक्त यहां महामाया देवी के दर्शन कर मॉ समलेश्वरी के दर्शन जरुर करते है तभी पूजा पूर्ण मानी जाती है. मंदिर के गर्भगृह में सूर्योदय के समय समलेश्वरी माता के गर्भगृह में सूर्य की किरणें पहुंचती हैं और सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें मॉ महामाया के गर्भगृह में इनके चरणों को स्पर्श करती हैं.

माता के दर्शन के लिए खड़ा होना पड़ता है तिरछा

जानकारों के मुताबिक श्री यंत्र के आकार में मंदिर के गुंबद का निर्माण हुआ है, तांत्रिक पद्धति से बने इस मंदिर के गर्भगृह में मां महामाया मां काली के स्वरूप में विराजमान हैं. मां महामाया के दर्शन के लिए भक्तों को मंदिर के गर्भगृह के मुख्य द्वार से थोड़ा तिरछा खड़ा होना होता है. मंदिर के गर्भगृह के बाहरी हिस्से में दो खिड़कियां एक सीध पर हैं. सामान्यतः दोनों खिड़कियों से मां की प्रतिमा की झलक नजर आनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता. दाईं तरफ की खिड़की से मां की प्रतिमा का कुछ हिस्सा नजर आता है परंतु बाईं तरफ नहीं.

मॉ महामाया से जुड़ी ये है मान्यता

मान्यताओं के अनुसार राजा मोरध्वज सेना के साथ खारुन नदी तट पर पहुंचे. यहां उन्हें मां महामाया की प्रतिमा दिखाई दी. राजा करीब पहुंचे तो उन्हें सुनाई दिया कि मां उनसे कुछ कह रही हैं. मां ने कहा कि वे रायपुर नगर के लोगों के बीच रहना चाहती हैं. इसके लिए मंदिर तैयार किया जाए. राजा ने माता के आदेश का पालन करते हुए पुरानी बस्ती में मंदिर तैयार करवाया. मां ने राजा से कहा था कि वह उनकी प्रतिमा को अपने कंधे पर रखकर मंदिर तक ले जाएं. रास्ते में प्रतिमा को कहीं रखें नहीं. अगर प्रतिमा को कहीं रखा तो मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगी. राजा ने मंदिर पहुंचने तक प्रतिमा को कहीं नहीं रखा लेकिन मंदिर के गर्भगृह में पहुंचने के बाद वे मां की बात भूल गए और जहां स्थापित किया जाना था, उसके पहले ही एक चबूतरे पर रख दिया. बस प्रतिमा वहीं स्थापित हो गई.

राजा ने प्रतिमा को उठाकर निर्धारित जगह पर रखने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे. प्रतिमा को रखने के लिए जो जगह बनाई गई थी वह कुछ ऊंचा स्थान था. इसी वजह से मां की प्रतिमा चौखट से तिरछी दिखाई पड़ती है.

ये हैं नवरात्र की नौ तिथियां
प्रतिपदा 2 अप्रैल शैलपुत्री
द्वितीय 3 अप्रैल ब्रह्मचारिणी
तृतीया 4 अप्रैल चंद्रघंटा
चतुर्थी 5 अप्रैल कूष्मांडा
पंचमी 6 अप्रैल स्कंदमाता
षष्टी 7 अप्रैल कात्यायनी
सप्तमी 8 अप्रैल कालरात्रि
अष्टमी 9 अप्रैल महागौरी
नवमी 10 अप्रैल सिद्धिदात्री, रामनवमी

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