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हिमाचल में मस्जिदों को हटाने की मांग: सड़कों पर उतरे लोग

शिमला :- हिमाचल प्रदेश में मस्जिदों को हटाने की मांग का मामला सामाजिक और राजनैतिक संदर्भ में चर्चा का विषय बन गया है। यह मांग विभिन्न कारणों से उत्पन्न हुई है, जिसमें धार्मिक असहिष्णुता, सांस्कृतिक पहचान की रक्षा और भूमि उपयोग नीति के मुद्दे शामिल हैं। कुछ लोगों का तर्क है कि मस्जिदें स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के विपरीत हैं, जिससे एक संकीर्ण दृष्टिकोण का विकास हो रहा है।

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इस मांग के पीछे कुछ परिस्थितियाँ भी हैं, जैसे कि राज्य में बढ़ती जनसंख्या और भूमि पर दबाव। स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि मास्जिदों का स्थान बदल देना चाहिए ताकि वहाँ विकासात्मक परियोजनाएँ लागू की जा सकें। यह आंदोलन न केवल धार्मिक भावना को प्रभावित करता है, बल्कि यह राजनीतिक दलों द्वारा भी अपने लाभ के लिए उठाया जा रहा है। विभिन्न राजनीतिक दल और नेता इसकी समस्या को अपने हित में भुना रहे हैं, जिससे इस मुद्दे पर और भी विभाजन उत्पन्न हुआ है।

हिमाचल प्रदेश में यह अनुरोध केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक ताना-बाना को भी प्रभावित करने वाला है। जब लोग सड़कों पर उतरे और अपनी आवाज उठाई, तो इसने समाज में ध्रुवीकरण की भावना को और बढ़ा दिया। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि इस मसले पर चर्चा सरकारी स्तर पर भी होनी शुरू हो गई है। यद्यपि राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर कोई निश्चित निर्णय नहीं लिया है, लेकिन मस्जिदों और उनके स्थान की पहचान करने के लिए अध्ययन और सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

क्योँ उपजा विवाद

हिमाचल प्रदेश की डेमोग्राफी देखें तो यहां मुस्लिम आबादी 3% से भी कम है। ज्यादातर मुसलमान बाहरी राज्‍यों से यहां काम की तलाश में आए और बस गए। इनमें भी बड़ी संख्‍या कश्‍मीरी मुसलमानों की है, जो दशकों से कंधे पर भारी सामान ढोने का काम करते हैं। इन्‍हें यहां ‘खान’ कहकर पुकारा जाता है। ये ‘खान’ हमेशा से शिमला के व्यापारी वर्ग की लाइफलाइन रहे हैं। ये स्वभाव से इतने सीधे और सरल हैं कि शायद ही कभी इनका किसी से कोई विवाद हुआ हो। विवाद का कारण पश्चिमी यूपी और बिहार से रोजगार के लिए आए मुस्लिम युवा बन रहे हैं, जो हिमाचल की संस्कृति से वाकिफ नहीं।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मस्जिदों का होना स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बन गया है, और उनकी मांग यह है कि इनको हटाने की कार्रवाई तात्कालिक रूप से की जानी चाहिए। इन्हें लगता है कि इस कदम से न केवल उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और पहचान को बचाया जा सकेगा, बल्कि स्थानीय समुदाय की एकता भी सुनिश्चित होगी। आंदोलन में शामिल व्यक्तियों का तर्क है कि उनकी सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे धार्मिक प्रतीक हटाए जाएँ जो उन्हें असुरक्षित महसूस कराने का कारण बनते हैं।

अवैध निर्माण 60 और 70 के दशक में मुसलमानों ने नमाज पढ़ने के लिए छोटी-छोटी कच्‍ची मस्जिदें बनाई थीं। ज्‍यादातर का निर्माण निजी जमीनों पर हुआ। मुसलमानों को इबादत के लिए कुछ जमीन दान में भी दी गई। जैसे मंडी के राजा ने एक मुसलमान बुनकर से खुश होकर उसे जगह दी, जहां छोटी-सी मस्जिद बन गई। आगे चलकर बंदोबस्त रेकॉर्ड में यह भूमि मस्जिद के रूप में दर्ज हो गई। हाल के बरसों में बाहर से आए मुस्लिमों की संख्या बढ़ी। यूपी और बिहार से आए ज्यादातर मुसलमान पेशे से बढ़ई, नाई, दर्जी हैं। बाद में ये अपने रिश्तेदारों को भी ले आए, जो पटरी पर दुकानदारी करने लगे। फिर इन्होंने दुकानें खरीद लीं। आबादी बढ़ने के साथ पिछले 10 बरसों में मस्जिदों का आकार भी बढ़ने लगा। पुनर्निर्माण के नाम पर इनकी मंजिलें बढ़ने लगीं। संजौली की विवादित मस्जिद भी पांच मंजिल की हो गई। जाहिर है, इसके लिए किसी स्थानीय निकाय से इजाजत नहीं ली गई। ऐसा कमोबेश हिमाचल के सभी जिलों में हुआ।

हालांकि, इस मुद्दे पर कुछ स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया अधिक तरल रही है। कुछ लोगों का मानना है कि यह कदम भेदभाव का प्रतीक है और धार्मिक सहिष्णुता के खिलाफ है। उनका तर्क है कि सभी धर्मों और उनके अनुयायियों के प्रति सम्मान होना चाहिए, और मस्जिदों को हटाने की मांग से समाज में विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। स्थानीय स्तर पर चल रहे इन विचारों और भावनाओं ने हिमाचल में इस मुद्दे को और अधिक जटिल बनाया है, जो सामाजिक ताने-बाने पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।

राजनीतिक और धार्मिक प्रभाव

हाल ही में हिमाचल में मस्जिदों को हटाने की मांग ने न केवल स्थानीय समुदाय में हलचल पैदा की है, बल्कि इसके राजनीतिक और धार्मिक परिणाम भी व्यापक हैं। इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कुछ राजनीतिक दलों ने इस मांग का समर्थन किया है, जबकि अन्य ने इसे विभाजनकारी करार देते हुए उच्चस्तरीय राजनीति का एक हिस्सा बताया है। इन बयानों का उद्देश्य अपने मतदाताओं को प्रभावित करना और अपने राजनीतिक मंच को मजबूत करना है।

यह मसला धार्मिक संगठनों के लिए भी महत्वपूर्ण है; कई धार्मिक समूहों ने इस मांग की कठोर निंदा की है। उनका कहना है कि मस्जिदों को हटाने की मांग सांप्रदायिकता को बढ़ावा देती है और समाज में तनाव और असहमति को जन्म देती है। ऐसे में, धार्मिक नेताओं ने सद्भाव और सहिष्णुता की बात करते हुए सभी समुदायों के बीच एकता पर जोर दिया है। इसके तहत, विभिन्न धार्मिक संगठनों ने संयुक्त रूप से एक घोषणापत्र पेश किया है, जिसमें मानवता के उच्च मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और धार्मिक संगठनों की सक्रियता के साथ-साथ, इस घटना का हिमाचल की स्थानीय राजनीति पर भी काफी असर पड़ सकता है। आगामी चुनावों में यह विषय एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है, जिसके परिणामस्वरूप कई राजनीतिक दल अपने चुनावी रणनीतियों में बदलाव कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी, इस मसले से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होना तय है, जिससे केंद्रीय सरकार और विपक्ष के बीच टकराव की संभावना बढ़ सकती है। इसे देखते हुए, भविष्य में धर्म और राजनीति के बीच बढ़ते मतभेद और सामंजस्य की आवश्यकता पर विचार करना आवश्यक रहेगा।

विभिन्न दृष्टिकोण और संभावित समाधान

हिमाचल में मस्जिदों को हटाने की मांग को लेकर उठे विवाद ने विभिन्न दृष्टिकोणों को जन्म दिया है, जिनमें समर्थन और विरोध दोनों पक्ष शामिल हैं। समर्थकों का मानना है कि मस्जिदों का स्थान राज्य की सांस्कृतिक पहचान से मेल नहीं खाता। उनका तर्क है कि ये धार्मिक स्थल अन्य धार्मिक प्रतीकों के साथ सामंजस्य नहीं बैठाते। दूसरी ओर, विरोधियों का कहना है कि इस तरह की गतिविधियाँ धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक एकता को कमजोर करती हैं। वे तर्क करते हैं कि मस्जिदों को हटाने की मांग सांप्रदायिक पहचान को बढ़ावा देती है और इससे शांति भंग होने का खतरा बढ़ता है।

समाज के विभिन्न तबकों में इस मुद्दे पर गहरी चिंता व्याप्त है, जिसमें राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक आयाम शामिल हैं। इस प्रकार की चर्चाओं के दौरान, संवाद का महत्व और आवश्यक हो जाता है। सभी हितधारकों को एकत्रित करके खुले मंच पर चर्चा आयोजित की जानी चाहिए, ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने का अवसर मिल सके। यह संवादी प्रक्रिया मानव अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशीलता को भी बढ़ावा देगी।

संभावित समाधान के तौर पर, अंतर-धार्मिक संवाद के माध्यम से सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। स्थानीय समुदायों को जोड़ने वाले कार्यक्रम आयोजित कर, उनका दृष्टिकोण समझा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, मस्जिदों के आसपास एक सांस्कृतिक संवाद स्थापित करने से भी सामुदायिक समरसता को मजबूत किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में स्थानीय नेताओं और धार्मिक प्रमुखों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, जो विभिन्न पक्षों के बीच सेतु का कार्य कर सकते हैं।

अंततः, यह आवश्यक है कि हिमाचल में हो रही इस मांग के संदर्भ में सभी दृष्टिकोणों का सम्मान किया जाए और स्थितियों को सामान्य करने के लिए उचित कदम उठाए जाएं। इससे समाज में एकता और समन्वय को बढ़ावा मिलेगा।

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