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शादी के बाद माता-पिता के प्रति बेटे की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती: CG हाईकोर्ट

बिलासपुर :- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में कहा है कि विवाह के बाद पति की अपने बुजुर्ग और बीमार माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। यदि पत्नी बिना उचित कारण पति पर माता-पिता से अलग रहने के लिए लगातार दबाव बनाती है, तो ऐसी स्थिति पति के प्रति मानसिक क्रूरता मानी जा सकती है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी।

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कोर्ट ने कहा कि शादी के बाद पति-पत्नी अपना नया परिवार शुरू करते हैं, लेकिन इससे माता-पिता के प्रति संतान का दायित्व समाप्त नहीं हो जाता। खासकर जब माता-पिता बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार हों, तब उनकी देखभाल करना बेटे की जिम्मेदारी का हिस्सा है। कोर्ट ने माना कि पत्नी द्वारा बिना ठोस वजह के पति को उसके बीमार माता-पिता से अलग रहने के लिए लगातार दबाव देना वैवाहिक संबंधों में मानसिक क्रूरता की स्थिति पैदा कर सकता है।

मामला राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ का है। यहां रहने वाले एक सिख युवक का विवाह 8 मार्च 2007 को पत्थलगांव निवासी महिला से हुआ था। शादी के करीब एक साल बाद दोनों के बीच पारिवारिक मतभेद शुरू हो गए।
पति ने फैमिली कोर्ट में आरोप लगाया था कि उसके पिता गंभीर हृदय रोग से पीड़ित हैं और उनकी तीन बार हार्ट सर्जरी हो चुकी है। इसके बावजूद पत्नी उस पर माता-पिता को छोड़कर अलग रहने का दबाव बनाती थी।

पति का आरोप था कि उसकी बात नहीं मानने पर पत्नी सास-ससुर के साथ दुर्व्यवहार करती थी। वह बिना बताए छोटे बेटे को लेकर मायके भी चली जाती थी। वर्ष 2018 में दोनों परिवारों के रिश्तेदारों की मौजूदगी में सामाजिक स्तर पर विवाद सुलझाने का प्रयास किया गया। उस दौरान पत्नी ने लिखित माफीनामा भी दिया था। हालांकि, पति के अनुसार इसके बाद भी परिस्थितियों में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ और विवाद लगातार बना रहा।

लगातार विवाद से परेशान होकर पति ने डोंगरगढ़ फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की। सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट ने 11 नवंबर 2024 को मानसिक क्रूरता के आधार पर पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की।
इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी ने आरोप लगाया कि उसकी सास के उकसाने पर पति उसके साथ प्रताड़ना करता था। उसने यह भी दावा किया कि पेट्रोल पंप शुरू करने के लिए उसके मायके से 50 लाख रुपए की मांग की गई थी। माफीनामे पर जबरन हस्ताक्षर कराने का आरोप भी लगाया गया।

हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की। कोर्ट ने पत्नी की ओर से लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया। खास तौर पर पत्नी के भाई और मामा के बयानों को भी देखा गया, जिन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने माफीनामा पढ़ने के बाद अपनी सहमति से उस पर हस्ताक्षर किए थे। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में माता-पिता की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है। वैवाहिक संबंध किसी व्यक्ति को अपने माता-पिता के प्रति जिम्मेदारियों से पूरी तरह अलग होने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।
कोर्ट ने माना कि पति का अपने गंभीर रूप से बीमार पिता की देखभाल के लिए अलग रहने से इनकार करना परिस्थितियों में स्वाभाविक और उचित था। वहीं, पत्नी का लगातार उसे माता-पिता से अलग रहने के लिए दबाव देना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

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