वेब-डेस्क :- सुप्रीम कोर्ट में वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को लेकर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछते हुए कानून के कुछ प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई। बुधवार को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने सरकार से पूछा कि क्या वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति का निर्णय धार्मिक संतुलन को बिगाड़ सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से तीन बिंदुओं पर चिंता जताई :-
- वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति
- वक्फ घोषित संपत्तियों को अदालत के फैसले के बावजूद डिनोटिफाई करने का प्रावधान
- वक्फ बाय यूज़र की मान्यता को सीमित करने की कोशिश
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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या सीमित रहेगी। इस पर कोर्ट ने पूछा, “अगर केंद्रीय वक्फ परिषद में 22 में से केवल 8 सदस्य मुस्लिम हैं, तो क्या यह संस्था अपने धार्मिक स्वरूप को बनाए रख पाएगी?
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि “जब हम बेंच पर बैठते हैं, तो धर्म से ऊपर उठकर न्याय करते हैं। हमारे लिए दोनों पक्ष बराबर होते हैं।”
वक्फ बाय यूज़र को लेकर कोर्ट की टिप्पणी:
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई संपत्ति लंबे समय से धार्मिक या सामाजिक उपयोग में है, तो जरूरी नहीं कि उसके पास दस्तावेज़ हों। उसे खारिज करना ऐतिहासिक सच्चाइयों की अनदेखी होगी।
सरकार की दलील:
सरकार ने कहा कि यह कानून पूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया के तहत पास हुआ है। इसमें व्यापक विमर्श हुआ और लाखों सुझावों को शामिल किया गया।
क्या रोक लगी?
फिलहाल कोर्ट ने कोई औपचारिक रोक नहीं लगाई है, लेकिन अंतरिम आदेश की संभावना व्यक्त की है। अगली सुनवाई गुरुवार को होगी।
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