EPF नियमों में बड़ा बदलाव: अब बेसिक सैलरी का 12% कटना अनिवार्य नहीं

EPF नियमों में बड़ा बदलाव: अब बेसिक सैलरी का 12% कटना अनिवार्य नहीं

नई दिल्ली :- कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है। नई कर्मचारी भविष्य निधि योजना-2026 के तहत अब कर्मचारियों और कंपनियों के लिए अनिवार्य पीएफ अंशदान को तय वेतन सीमा से जोड़ा गया है। इस बदलाव से कर्मचारियों की इन-हैंड सैलरी बढ़ने की संभावना है, लेकिन इसके साथ रिटायरमेंट बचत पर असर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
नई व्यवस्था के तहत अब कंपनियों के लिए कर्मचारी के वेतन का पूरा 12% पीएफ में जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं रहेगा। नियम के मुताबिक, 15 हजार रुपए की वैधानिक वेतन सीमा के आधार पर केवल 1,800 रुपए तक का अंशदान अनिवार्य होगा। इससे अधिक योगदान कर्मचारी और कंपनी की आपसी सहमति पर जारी रह सकेगा।

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इस बदलाव के बाद कर्मचारियों को यह विकल्प मिलेगा कि वे अपने भविष्य निधि खाते में अधिक राशि जमा करना चाहते हैं या ज्यादा इन-हैंड सैलरी लेना पसंद करेंगे। हालांकि, अतिरिक्त योगदान जारी रखने की स्थिति में कंपनी के लिए बराबर राशि जमा करना जरूरी नहीं होगा, जब तक कि कंपनी की नीति या रोजगार अनुबंध में ऐसा प्रावधान न हो।
नए नियमों में दावा निपटान प्रक्रिया को लेकर भी बदलाव किए गए हैं। पीएफ निकासी, पेंशन या बीमा संबंधी दावों को 20 दिनों के भीतर निपटाना होगा। तय समय सीमा के बिना उचित कारण देरी होने पर संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई की जा सकती है और 12 प्रतिशत वार्षिक दंडात्मक ब्याज भी लगाया जा सकता है।
इन-हैंड सैलरी बढ़ सकती है, लेकिन भविष्य की बचत घटने का जोखिम
यदि किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 30 हजार रुपए है, तो पहले उसके पीएफ खाते में 3,600 रुपए जमा होते थे। नए नियमों के बाद अनिवार्य कटौती 1,800 रुपए तक सीमित हो सकती है। ऐसे में शेष राशि सैलरी का हिस्सा बन सकती है, जिससे कर्मचारियों के हाथ में हर महीने अधिक पैसा आ सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि कम पीएफ योगदान का असर लंबी अवधि की बचत पर पड़ सकता है। पीएफ पर मिलने वाला ब्याज लंबे समय में मजबूत रिटायरमेंट फंड तैयार करने में मदद करता है। ऐसे में सिर्फ अधिक मासिक सैलरी को प्राथमिकता देने वाले कर्मचारियों की भविष्य की वित्तीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
कंपनियों को भी मिल सकती है राहत
नई व्यवस्था से कंपनियों को वेतन ढांचा तैयार करने में अधिक लचीलापन मिलने की संभावना है। विशेष रूप से उन संस्थानों को राहत मिल सकती है जो उच्च वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए अधिक पीएफ योगदान कर रही थीं। अब कंपनियां अपनी नीति और कर्मचारियों की सहमति के आधार पर निर्णय ले सकेंगी।

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